देश या परिवार ?

ये कविता उस राष्ट्रवादी युवा के मन की दुविधा को व्यतीत करती है, जो अपने घर की जिम्मेदारी और देश के संकटों में अपनी कर्तृत्व के बीच में असमंजस में आ गया है | 

राष्ट्र-निर्माण के इस यज्ञ में,
समय आहुति के लिए पुकारता ।
पुकार अनसुनी करके वो शक्स,
अपने परिवार के सपने साकारता ।

देश संकटों में घिरा हुआ,
रक्त की नदियाँ मांगता रहा ।
अपनी बहन के विवाह संबंध में,
वो खून-पसीना एक करता रहा ।

क्रांतिवीरों की महफ़िल सजी,
देश की हालात पर हाहा-कर मची ।
विवाह के दिन बहन की डोली सजी,
विदाई के समय शहनाई बजी ।

शहीदों के अस्थि-कलश जमा हुए,
उनके रख से माथे सजे ।
उस आंखों से आसू बह गया,
जब दुल्हन की मांग में सिंदूर भरा गया ।

आखरी संग्राम का शंक्नाद हुआ,
उस शख्स को जोड़ने की आवाज लगादी ।
अपने परिवार के लिए उसने मांगी दुवा,
देश-द्रोहियों को काटने तलवार उठाली ।

देश के लिए बलिदान दिया,
अमर-गाथा ने याद किया ।
‘वन्दे भूमि’ में मिल गया,
परिवार नहीं, देश के लिए मर गया ।
- आनंद पुरोहित

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