Days of Engineering and Nights of Poetry - Random Lines
जेल की चार दीवारों में,
ये कानून का रखवाला कितनी देर हमें रखेगा ।
कल फिर नया सूरज उगेगा,
कल फिर भारत माता की जय बोलने,
देश का युवा घर से निकलेगा ।
काल-चक्र में फँसा हुआ,
वो पंछी उड़ना भूल गया ।
On 2014 Varanasi Loksabha Elections:
स्तुडियोवा भूल के भय्या,
न्यूज एन्कर्स कौनो बिराजे घाटो में |
दिल्ली-मुंबई का पिलाकर पानी,
काशी होयबे राजनीतिक राजधानी ||
गंगा-जमुना तेहजीब का रत लगाकर,
'धर्मनिरपेक्षता' में पार्टीया फ़सी |
प्रत्याशी होयबे कन्फ्युज,
बनारस, काशी की वाराणसी ||
बाजार से गुजरू लेकिन खरिद्दार नही।
हर समय होश में लेकन होशियार नही।
मिलेगी मंजिल मुझे मेरे अरमान कुछ बोलते है ।
रहता हूँ खामोश लेकिन मेरे हुनर कुछ बोलते है ।
ये कानून का रखवाला कितनी देर हमें रखेगा ।
कल फिर नया सूरज उगेगा,
कल फिर भारत माता की जय बोलने,
देश का युवा घर से निकलेगा ।
काल-चक्र में फँसा हुआ,
वो पंछी उड़ना भूल गया ।
On 2014 Varanasi Loksabha Elections:
स्तुडियोवा भूल के भय्या,
न्यूज एन्कर्स कौनो बिराजे घाटो में |
दिल्ली-मुंबई का पिलाकर पानी,
काशी होयबे राजनीतिक राजधानी ||
गंगा-जमुना तेहजीब का रत लगाकर,
'धर्मनिरपेक्षता' में पार्टीया फ़सी |
प्रत्याशी होयबे कन्फ्युज,
बनारस, काशी की वाराणसी ||
अन्दाज़ कुछ अलग है,
मेरे सोचने का | मंज़िल का सबको शौक़ है, मुझे रास्ते का || |
बाजार से गुजरू लेकिन खरिद्दार नही।
हर समय होश में लेकन होशियार नही।
मिलेगी मंजिल मुझे मेरे अरमान कुछ बोलते है ।
रहता हूँ खामोश लेकिन मेरे हुनर कुछ बोलते है ।
नेक इरादों को मंजिल मिले न मिले,
नेक इंसान मिल जाते है |
दिखता आगे हजारों के,
हँसता खडा हूँ किनारों पे !
ना हार से, ना जीत से,
भयभित हूँ उस प्रीत से । जो अपनों के निराले मत से, हटादे उन्हें स्वयंम के पथ से ।
दूर खड़े वह अपनों से अब नहीं लगता डर,
अब पुकार के सुनलिये उन्होंने स्वर.
अब हाथ बढाकर खाडू नहीं हू पूरी रात,
हर दिन जरुर मिलेगा उनका साथ.
प्रेम की साँसे लेता हुँ,
बावरासा गीत कहता हुँ। सोनेकी रोशनीमें नही, धूलके अंधेरेमें रहता हुँ।
हाथ से हाथ मिलाते है,
हम अपनी बात बताते है। दिलमें बस इतना ही अरमान सजाते है, अपने देशको ही अपना भाग्य बताते है। जब शिक्षाके दलाल छात्र को सताते है, हम अपने हककोंकी बात करते है, हम उन्हें संघर्ष की वो रात याद दिलाते है।
हँसता-गिरता संभल पड़ा हुँ।
नया ठिकाना लिए चल पड़ा हूँ।
हर हाथ से हाथ मिलाओ,
कुछ उनकी सुनो, कुछ अपनी सुनाओ। इंसान से इंसान समजकर जुड़ जाओ, देशको अपने आप एक पाओ। |
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